गुरुवार, 19 मई 2011

राहु का तर्पण क्या है?

ग्रहों में राहु और केतु का स्थान छाया ग्रह के रूप में जाना जाता है। यह दोनो ग्रह लालकिताब के अनुसार शनि के चेले यानी शिष्य कहे गये है और माना जाता है कि शनि रूपी सांप का राहु मुँह है और केतु को शनि रूपी सांप की पूँछ यानी Tail कहा जाता है। लेकिन पाश्चात्य ज्योतिष में यह दोनो ही चन्द्रमा के दोनो ध्रुवो के रूप में जाने जाते है यानी उत्तरी ध्रुव को राहु और दक्षिणी ध्रुव को केतु के रूप में माना जाता है। इस बात को मान्यता तो देनी पडेगी कि राहु और केतु चन्द्रमा से अपना सम्बन्ध रखते है। इस बात के लिये राहु का समय यानी अश्विन के समय में जो पितर पक्ष कहा जाता है में पितरों के प्रति दान और पुण्य के साथ ब्राह्मण भोजन को मुख्य माना जाता है जो भी अपने पूर्वजों पर विश्वास करते है और अपने पितरों के प्रति मान्यता रखते है,अपने कुल की मर्यादा और अपने खून की मान्यता को जिन्दा रखना चाहते है वे अपने पितरों के प्रति जरूरी मान्यता को लेकर चलते है। राहु को उर्दू शब्द के अनुसार रूह की श्रेणी में भी लाया जाता है,यानी व्यक्ति के पितरों की रूह उनके साथ चलती है और जातक के अच्छे या बुरे वक्त पर अपनी अपनी ताकत के अनुसार सहायता करती है। जब सूर्य गुरु और राहु की युति को नाडी ज्योतिष से पढा जाता है तो कहा जाता है कि गुरु से जीव यानी जातक सूर्य से आत्मा के रूप में राहु यानी पूर्वजों के रूप में आया है,यानी पूर्व का पूर्वज ही जातक के रूप में जन्म लेकर परिवार में आया है। राहु का रूप मानसिक तर्पण से भी माना जाता है और श्रद्धा के रूप में भी देखा जाता है,भावनाओं को समर्पित करने के लिये भी पितरों के लिये ब्राह्मणो को भोजन करवाया जाता है लोगों के लिये ठहरने के लिये धर्मशाला और पानी के लिये कुये तालाब और प्याऊ आदि का बन्दोबस्त करवाना भी इसी राहु की श्रेणी में आता है,जहां पूर्वजों के नाम से कोई कार्य किया जाये वह राहु की श्रेणी में आता है।
पितरों की मान्यता को आजकल के जमाने में बहुत कम ही लोग जानते है,मुश्लिम समुदाय में पितरों के लिये ताजिये निकालने का रूप देखा जाता है हिन्दू में कनागत के रूप में पितरों को देखा जाता है और अन्य धर्मों के अनुसार भी पितरों की अपने अपने अनुसार ही मान्यता का समय मिलना पाया जाता है। कहा भी जाता है कि पूर्वजों की पूजा से ही सभी धर्मों का निकास हुआ है,और उन्ही धर्मों का अधिक विकास होता है जो पूर्वजों के नाम से पूजे जाते है।
जब कुंडली में राहु अपने अनुसार फ़लदायी होता है तो वह अक्सर वृश्चिक का राहु शमशानी आत्माओं के रूप मे देखा जाता है मीन का राहु आसमानी शक्तियों के रूप में माना जाता है,कर्क का राहु घर के अन्दर की आत्मा का रूप बताती है,कुम्भ का राहु पिता के साथ चलने वाली पुराने कुटुम्ब की आत्मा के रूप में माना जाता है कन्या का राहु बीमारी और आफ़त को देने वाला माना जाता है,लगन का राहु अपने में ही मस्त रहने वाला माना जाता है तो मंगल के साथ राहु खून के अन्दर उत्तेजना देने वाला माना जाता है यह भाव अगर स्त्री की कुंडली में होता है तो वह पुरुष की तरफ़ आकर्षित होने की बात से मना नही कर सकती है और विजातीय सम्बन्ध अक्सर देखने में आते है,शुक्र के साथ राहु अगर पुरुष की कुंडली में होता है तो वह भी स्त्री के प्रेम प्रसंग के कारण अपने परिवार कुल आदि की मान्यता को छोड कर अपनी खुद की गृहस्थी को बसाने का काम करता है।
राहु के तर्पण के लिये समुद्र के किनारे के शिव स्थान को चुना जाता है और पुराणों के अनुसार दक्षिण दिशा को ही पितरों का स्थान माना जाता है अमावस्या का दिन ही पितरों के लिये अधिक मान्यता रखता है,शिवजी को जो दक्षिण दिशा में स्थापित होते है,उन्हे पितरों का स्वामी माना जाता है। समुद्र के किनारे के शिव स्थान में जाकर पहले स्नान करने के बाद उन्ही गीले कपडों में शिवजी के सामने अपने पितरों के रूप में मान्यता करने के बाद उन्हे नमस्कार किया जाता है,फ़िर किसी योग्य पंडित से शिवजी के प्रति पूर्वजों के नाम और गोत्र के नाम से दुग्धाभिषेख,जलाभिषेख,पंचामृत का अभिशेष आदि किया जाता है,तीर्थ स्थान में बैठकर पंडितों के द्वारा जौ चावल शहद तिल घी से हवन किया जाता है,पितरों के लिये समुद्र के किनारे के शिवलिंग जैसे एक एक पितर के लिये पिंड बनाये जाते है और कुल चौंतीस पिंड बनाकर उनके लिये अभिशेख करने के बाद वैदिक मन्त्रों से पूजा की जाती है,फ़िर पंडित ही उन्हे अलग अलग पितरों के नाम से चौंतीस पूर्वजों को जो दादा परदादा प्रपितामह आदि के रूप में होते है उनका सन्तुष्टि से समुद्र के पानी में प्रवाह कर दिया जाता है,गायों और कौओं को उदद के बने पकोडे खिलाये जाते है,चावल को दही के साथ मिलाकर गरीबों को भोजन करवाया जाता है,उसके बाद प्रसाद अगर परिजन साथ होते है तो उन्हे दे दिया जाता है और नही होते है तो डाक आदि के पते से भेज दिया जाता है। रामेश्वरम में यह कार्य आज के समय में लगभग बावन सौ रुपया में पूरा हो जाता है,जो लोग बाहर रहते है जिन्हे रामेश्वरम आने जाने या अमावस्या के दिन ही आने में दिक्कत होती है वे अपने अपने अनुसार अपने अपने पंडितों से यह तर्पण का कार्य करवा देते है,उसके लिये उन्हे अपने नाम अपने जीवन साथी का नाम पिता का नाम माता का नाम दादा का नाम दादी का नाम नाना का नाम नानी का नाम और उनके गोत्र का नाम भेजना पडता है साथ ही उनके निवास का पता मय टेलीफ़ोन नम्बर और पिनकोड के भेजना पडता है जहां उन्हे प्रसाद भेजा जाता है।

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